इस ऑडियोबुक के बारे में
अलेक्सांद्र चात्स्की मॉस्को लौटकर ऐसे समाज में प्रवेश करता है जिसकी परिचित आदतें अब उसे सहज स्वीकार्य नहीं लगतीं। उसकी तीखी टिप्पणियाँ फ़ामुसोव के घर की सुविधाजनक धारणाएँ हिला देती हैं। सोफ़िया के प्रति भावनाएँ उसके निर्णयों के आत्मविश्वास को भी जटिल बनाती हैं। परिचित लोगों के बीच वापसी आचरण, प्रतिष्ठा और खुलकर बोलने के अधिकार का संघर्ष बन जाती है।
अलेक्सांद्र ग्रिबोयेदोव बातचीत, ग़लतफ़हमी और तेज़ी से फैलती राय से नाटक को गति देते हैं। सामाजिक स्थिति तथा स्वीकृत व्यवहार किसी अवलोकन की सच्चाई से अधिक महत्त्व पा सकते हैं। चात्स्की की बुद्धि उसे भावनात्मक अंधेपन से नहीं बचाती और न यह निश्चित करती है कि दूसरे उसकी बात सुनेंगे।
पद्य में लिखा यह हास्यनाटक रूढ़ियों के अनुरूप चलने, महत्त्वाकांक्षा और अपने बचाव में जुटे समाज में स्वतंत्र आवाज़ की स्थिति को परखता है। प्रशंसा तथा गपशप की परिचित आदतें इसके हास्य का आधार हैं। सिद्धांत की रक्षा और आहत निजी अपेक्षा के बीच की सीमा भी अनिश्चित रहती है।