इस ऑडियोबुक के बारे में
सन् 1924 के मॉस्को में प्रोफ़ेसर फ़िलिप प्रेओब्राझेंस्की शारिक नाम के एक आवारा कुत्ते को अपने घर लाते हैं। सहायक डॉक्टर बोर्मेन्ताल के साथ वे मानवीय ऊतकों का इस्तेमाल करके एक प्रयोग करते हैं। इसका परिणाम चौंकाने वाला है: कुत्ता मनुष्य बन जाता है और अपना नाम पोलिग्राफ पोलिग्राफ़ोविच शारिकोव रखता है। लेकिन वैज्ञानिक महत्त्वाकांक्षा के सामने जल्द ही रोज़मर्रा के सहजीवन की मुश्किलें आ खड़ी होती हैं।
शारिकोव का अभद्र व्यवहार और बढ़ती माँगें घर की व्यवस्था बिगाड़ देती हैं। मकान समिति के अध्यक्ष श्वोन्दर से उसकी निकटता इस टकराव को सामाजिक और राजनीतिक रूप भी देती है। मिखाइल बुल्गाकोव इस काल्पनिक स्थिति के माध्यम से शुरुआती सोवियत जीवन पर व्यंग्य करते हैं, जहाँ अधिकार की खींचतान निजी जगहों तक पहुँच जाती है।
यह कहानी उन लोगों की ज़िम्मेदारी पर सवाल उठाती है जो जीवों और समाज को अपनी योजना के अनुसार बदलना चाहते हैं। तीखा हास्य वैज्ञानिक अहंकार, सत्ता और नया मनुष्य बनाने की कोशिश के अप्रत्याशित परिणामों पर सोचने को प्रेरित करता है।